26 जनवरी 2026 के दिन भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन देश भर से आने वाले विशिष्ट अतिथियों का अभिनंदन करता है, और आपको भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की अनुभूति के लिए आमंत्रित करता है। इस बार, हम भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की एक झलक प्रस्तुत कर रहे हैं। ये अष्टलक्ष्मी राज्य हमारी सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध कलात्मक परंपराओं के जीवंत महोत्सव हैं।
इस निमंत्रण में भारत के पूर्वोतर क्षेत्र के प्रत्येक राज्य की विशिष्ट परंपरा, हस्तशिल्प की निपुणता, और उन प्राकृतिक तत्वों के सम्मिलन को प्रस्तुत किया गया है, जो वहाँ के लोगों के दैनिक जीवन की पहचान हैं। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की जीवंत विरासत और शिल्प परंपराओं के सुंदर चित्रण से युक्त यह निमंत्रण, गणतंत्र दिवस 2026 के उत्सव में आपकी सहभागिता के बाद भी, आपकी दीवारों की शोभा बढ़ाता रहेगा।
बाँस, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है, और बाँस से की गई बुनाई, निर्माण कार्यों तथा पारंपरिक शिल्पों के माध्यम से लोगों को आजीविका प्राप्त होती है। तेजी से बढ़ने और व्यापक स्तर पर उपयोगी होने के कारण, बाँस का उपयोग पर्यावरण-अनुकूल विकास को शक्ति प्रदान करता है।
निमंत्रण बॉक्स में बाँस की बुनी हुई चटाई का उपयोग किया गया है, जो करघे पर तैयार की गई है। इसके ताने (वार्प) में रंगे हुए सूती धागे और बाने (वेफ़्ट) में बाँस की बारीक पट्टियाँ इस्तेमाल की गई हैं। यह तकनीक त्रिपुरा राज्य में प्रचलित है। बाहरी कवर पर हाथ से बने कागज के टैग पर आपका पता लिखा है जो बाँस से बनी एक कलाकृति के साथ लगाया गया है। यह कलाकृति बाँस को विशेष तरीके से धुएँ में तपाकर बनाई गई है। इस प्रक्रिया से इस कलाकृति का रंग गहरा भूरा हो जाता है।
बाँस की अष्टकोणीय बुनाई पैटर्न वाली यह स्क्रोल, खुलने पर, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रत्येक राज्य की हस्तनिर्मित कृतियों का एक कलात्मक प्रदर्शन प्रस्तुत करती है। स्क्रोल की संरचना और तीन रंगों के धागे, कमर-करघे (लॉइन-लूम) के आकार का भी आभास कराते हैं। कमर-करघा बुनाई का एक उपकरण है, जिसका उपयोग भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में, विशेषकर महिलाओं द्वारा, विभिन्न प्रकार के कपड़े बुनने के लिए किया जाता है।
सिक्किम की विशिष्ट लेपचा बुनाई या 'थारा', परंपरागत रूप से बिच्छू घास (सिसनु) के रेशों से की जाती है। आधुनिक लेपचा बुनाई में बिच्छू घास के साथ सूती और ऊनी धागों का भी उपयोग होता है, जिन्हें कमर-करघे पर बुना जाता है। लेपचा लोक कथा के अनुसार, इस समुदाय का उद्धव कंचनजंघा पर्वत के निर्मल हिम से हुआ था। पर्वतों के साथ उनके पूर्वजों के इस विशेष संबंध, तथा भारत की पहली UNESCO 'मिक्स्ड हेरिटेज साइट', 'कंचनजंघा राष्ट्रीय उद्यान' के प्रति, इस कढ़ाई द्वारा सम्मान व्यक्त किया गया है।
मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स क्षेत्र में स्थित मौसिनराम पृथ्वी पर सबसे अधिक वर्षा के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहाँ की बाँस की बुनाई की परंपरा भी अत्यंत विकसित है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले कच्चे बांस में प्राकृतिक रूप से जलरोधी रेशे होते हैं, जिनमें हल्की हरी चमक बनी रहती है जो अन्य बाँस प्रजातियों से अलग है। स्क्रोल पर हरे बाँस का कोस्टर, यहाँ सामान्य रूप से उपयोग होने वाली वर्षा-ढाल या 'नुप' से प्रेरित है। इसमें बारीक बाँस की दो परतों को षट्कोणीय बुनाई में पिरोया जाता है, जिनके बीच ताड़ के पत्तों की एक परत रखी जाती है। इस तरह, भारी वर्षा से सुरक्षा देने वाला हल्का और टिकाऊ आवरण तैयार होता है।
अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कमेंग जिले में, मोनपा लोग जंगलों में शुगु शेंग झाड़ी की भीतरी छाल इकट्रा करने जाते हैं। छाल को उबालकर गूंथा जाता है और पल्प में तब्दील किया जाता है, फिर इसे पतला किया जाता है। इस मिश्रण को फ्रेम में डाला जाता है, और सूखने के लिए रखा जाता है, जिससे कागज की परतें बनती हैं। यह कागज बहुत मजबूत होता है, और आसानी से फटता नहीं है। मोन शुगु हस्तनिर्मित कागज का उपयोग ग्रंथों के लेखन, और रोजमर्रा के कार्यों के लिए किया जाता है। स्क्रोल पर, इस बहुप्रयोगी कागज को अरुणाचल प्रदेश के राज्य-पशु 'मिथुन' के विशेष आकार में ढाला गया है।
असम में रोंगाली बिहू (नववर्ष) का स्वागत गोगोना की मधुर धुनों के साथ किया जाता है, जिसके साथ ढोल और पेपा भी बजाए जाते हैं। बाँस से बनी यह जॉ-हार्प इन उत्सवों का अभिन्न अंग है। इस वाद्य यंत्र की बनावट वादक के अनुसार कुछ परिवर्तित होती है। पुरुषों की रामधन गोगोना छोटी, चौड़ी और भारी होती है; जबकि महिलाओं की लाहोरी गोगोना लंबी और पतली होती है, जिसे वे नृत्य के दौरान कभी-कभी बालों में हेयरपिन की तरह लगाती हैं। स्क्रोल में प्रदर्शित बच्चों की गोगोना छोटी और हल्की होती है, तथा बजाने में सबसे सरल।
त्रिपुरा में कुशल जनजातीय शिल्पकार बाँस और बेंत की बारीक पट्टियों से उत्कृष्ट आभूषण और सजावटी वस्तुएँ बनाते हैं। इन प्राकृतिक सामग्रियों को आकार देकर और बुनकर हल्के, टिकाऊ तथा आकर्षक रूपों में ढाला जाता है। ये सुंदर वस्तुएँ सरल उपकरणों और चिपकने वाले प्राकृतिक पदार्थों से बनाई जाती हैं। ये शिल्पकारों की कल्पना, दक्षता और कौशल को दर्शाती हैं।
नागालैंड की खियामनियुंगन नागा जनजाति द्वारा पहने जाने वाले इस वस्त्र के पीछे धीरे-धीरे विलुप्त होती परंपराओं के पुनर्निर्माण की एक गहरी कहानी है। स्थानीय महिलाएं ऑरेंज वाइल्ड रिया पौधे और बिच्छू घास (जिसे वहाँ 'एहलोन निउ' कहा जाता है) के तनों से प्राप्त रेशों से यह दुर्लभ वस्त्र बनाती हैं। रेशों को जंगलों से इकट्ठा किया जाता है, हाथ से बारीक धागों में अलग किया जाता है, सूत में काता जाता है और हाथ से बुना जाता है। चुनौतियों के बीच जन्मी यह कला, अब परंपराओं और गौरव का प्रतीक बन गई है। स्क्रॉल पर प्रदर्शित नमूना जॉब्स टीयर्स (गवेधुका या एडले मिलेट) पौधे के दानों से सजाया गया है, जिनका उपयोग इस क्षेत्र में आभूषण बनाने के लिए किया जाता है।
पुआन चेई एक शॉल अथवा घेरदार स्कर्ट है, जो मिज़ोरम में लोकप्रिय है। 'पुआन' शब्द का प्रयोग, मिज़ो लोगों के परिधान या कपड़ों के लिए किया जाता है; 'पुआन' से जुड़े उपसर्ग या प्रत्यय से उसके उपयोग की जानकारी मिलती है। 'चेई' का अर्थ है 'सजाना'। इसलिए, 'पुआन चेई' उन सजीले परिधानों को कहा जाता है जिन्हें महिलाएँ त्योहारों और शादियों जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर पहनती हैं। कपास के बने ये परिधान कमर-करघों पर बुने जाते हैं, और उनमें बारीक डिज़ाइन होती है।
बर्तन बनाने की इस प्राचीन तकनीक का उपयोग मणिपुर के तांगखुल नागा समुदाय द्वारा नवपाषाण काल से किया जा रहा है। लोंगपी पहाड़ियों के काले सर्पेन्टाइन पत्थरों के चूर्ण को स्थानीय मिट्टी के साथ मिलाकर बनाया जाना, इन बर्तनों की विशेषता है। इन्हें हाथ से आकार दिया जाता है, भट्टी में तपाया जाता है, और फिर पत्तियों से पॉलिश किया जाता है, जिससे इन्हें प्राकृतिक चमक प्राप्त होती है। स्क्रोल पर लगाई गई काली मिट्टी की कलाकृति, मणिपुर के राज्य-पुष्प 'शिरुई लिली' को दर्शाती है।
हाथ से बुना 'एरी' रेशम का एक स्टोल विशेष रूप से इस अवसर के लिए डिज़ाइन किया गया है। एरी रेशम, जिसे 'शांति सिल्क' या 'अहिंसा सिल्क' भी कहा जाता है, भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की वस्त्र परंपरा और अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्टोल में बुने गए रूपांकन भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के आठ राज्यों के पशु-पक्षियों और फूलों को दर्शाते हैं। इनसे इस क्षेत्र की जैव विविधता की सुंदर प्रस्तुति होती है। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, प्राकृतिक रंगों को स्थानीय पौधों से प्राप्त किया गया है। आगमन के समय अतिथियों का स्वागत पारंपरिक रूप से स्टोल पहनाकर किया जाएगा।